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satyendra


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वास्तु मतलब भवन में तोड़फोड़ नहीं

Posted On: 27 Jun, 2011  
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मेरा जुर्म और सजा

Posted On: 5 May, 2011  
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क्या प्यार की कोई हद नहीं होती

Posted On: 27 Apr, 2011  
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जाति ही पूछो जन की

Posted On: 1 Sep, 2010  
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Posted On: 1 Sep, 2010  
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भारतीय जाति व्यवस्था

Posted On: 1 Sep, 2010  
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ऊफ। यह क्या ?

Posted On: 8 Jun, 2010  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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दंतेवाड़ा का दंश

Posted On: 22 May, 2010  
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Others पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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यह है अखबार का दफ्तर

Posted On: 17 May, 2010  
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Others मस्ती मालगाड़ी में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ऑनर किलिंग के नाम पर होने वाला ये हत्या बहुत ही बुरा है. आज समाज हर बंधन को तोर कर तरकी कर रहा है हम सब आगे बढ़ने की बात कर रहे है. हमारा समाज परिवर्तित हो रहा है. हम नित नयी उचाई को चुने की कोसिस कर रहे है. लड़का लड़की में भेद नहीं करने क लिए कहा जा रा है, दहेज़ प्रथा एक सामाजिक अभिशाप बन गया है. दहेज़ क ही कारन इतनी भुरून हत्याए हो रही है. हमारे समाज से लडकियों को मिटाया जा रहा है. जाने अनजाने हर परिवार ये गुनाह कर रहा है. इसमें भी लडकियों क लिए नया कानून है . उसकर लिए ढेरो पाबंदिय है जो लडको के लिए नहीं है. लडको को आजादी है कुछभी करने क लिए लडकियों को नहीं है. लड़का कुछ गलत करे तो भी परिवार की इजत नहीं जाती लेकिन लड़की करे तो ऑनर किल्लिंग है न उससे हमारा समाज जीने का हक़ चीन लेता है. बह रे समाज. आज हमें जरुरी है इन दकियानुशी रुधिवादियो को तोरने की. ख़त्म करदेने की समाज से इन साडी बुरइयो को. लड़का लड़की के भेद भाव को. जाती और धर्म को. उन साडी चीजो को जो हमारी प्रगति के बाधक है. समाज के हर फश्लो को मिटने की जरुरत है और इसके लिए युवावो को एक होना होगा. जरा सोचिये कल्पना कीजिये उस समाज की जिसमे कोई जाती ,धर्म का बंधन नहीं हो, उच्च नीच का भेद भाव नहीं हो, समाज में कोई द्वेष नहीं हो, लड़का लड़की में कोई अंतर नहीं हो, सभी खुल कर जिए सबको अपना जीवन अपने तरीके से जीने की आजादी हो, दहेज़ मुक्त समाज हो, प्यार का वातावरण हो, अपना जीवन साथी चुनने का अधिकार हर लड़का लड़की को हो, जिसमे वे कभी जाती या धर्म के बारे में न सोचे आजाद हो कर अपनी जिन्दगी जिए, खुली हवा में सांश ले हर युवा, ऑनर किलिंग के नाम पे हत्याए बंद , लडकिय बोझ न रहे माँ बाप पर, भुरून हत्याए न हो , अपनी, अपने समाज की अपने देश की तरकी में सभी लड़का लड़की साथ साथ कदम बढ़ाये और सिर्फ विकाश की बात हो बात हो एक नए समाज की संरचना की जिसमे हो आजादी खुले आशमा में जीने की और चरो और हो सिर्फ विकाश...विकाश.. विकाश ..और विकाश, काश एषा हो पता और हमें जीने क लिए एक नयी समाज एक नया बातावरण और एक नई भारत मिल जाता. आप के इस लेख क लिए आप को कोटि कोटि बधाई सतेन्द्र बाबु. लेकिन अगर आप को लगे की मेरे सपने की भारत की जरुरत आज इस नए विकाशशील भारत को है तो मेरी बातो को दुनिया तक जरुर पहुचायेगा. खश कर जागरण के माध्यम से उन लोगो तक जो ऑनर किलिंग , भुरून हत्या, दहेज़ प्रथा और लड़का लड़की में भेद भाव रखने वाले समाज के डाकिया नुशी और घटिया सोच वाले लोग है. आशा है मेरी भी बात उनलोगों तक जरुर पहुचेगी. अभी बहुत कुछ बाकि है फिर कभी. जय भारत आपलोगोका अपना विकाश कुमार सिंह पटना , बिहार

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सतेंद्र जी आपका लेख पढ़ने के बाद मुझे यह समझ आया कि इसके लिए सिर्फ और सिर्फ समाज जिम्‍मेदार है। कोई अपनी बेटी या बेटे की हत्‍या नहीं करना चाहता। चाहे उसने किसी अन्‍य जाति या किसी अन्‍य धर्म में शादी की हो। आपने इस लेख में कुछ उदाहरण दिए हैं और दर्जनों उदाहरणों को जानने की भी बात कही है। मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि क्‍या आपने एक भी ऐसा उदाहरण नहीं देखा जहां की जोड़े ने अपने माता पिता की मर्जी से गैर धर्म और जाति में शादी की हो और वह अच्‍छी तरह से रह रहे हों। मुझे पूरा यकीन है कि आपने ऐसे भी उदाहरण जरूर देखे होंगे, लेकिन आपने यहां उनका उल्‍लेख नहीं किया। मैं ज्‍यादा नहीं दो ऐसे युगलों को जानता हूं जिन्‍होंने समाज के विरोध के बाद शादी की और वह अब खुशहाल जीवन व्‍यतीत कर रहे हैं। कहने का अर्थ यह है कि समाज को शिक्षित करने की जरूरत है न की ऑनर किलिंग।

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सत्येंद्र जी, किस जमाने की बात कर रहे है। दुनियां कहां पहुंच गई और आप आज भी जाति-पांति के चक्कर में उलझे हुए हैं। एक उदाहरण दूं--सन १९३० में प्रसिद्द समकालीन अमेरिकी इतिहासकार विल ड्यूरेंट ने एक पुस्तक लिखी थी जिसमें उसने उसने भारत की वर्तमान अवस्था पर कटाक्ष करते हुए टिप्पणी की थी की " वर्तमान में भारत की जाति व्यवस्था ४ भागो में विभाजित है ब्रह्मण अर्थात अंग्रेज नौकरशाही, क्षत्रिय अर्थात अंग्रेज सेना, वैश्य अर्थात अंग्रेज व्यपारी और अछूत शूद्र अर्थात हिन्दू जनता" इस पुस्तक में और भी अंग्रेजो की मक्कारियों का चिटठा खोला था और इसको अंग्रेजो ने प्रतिबंधित कर दिया था. मेरा यहाँ इस बात का उदाहरण देने का तात्पर्य केवल इतना है की आज हिन्दू या तो जातियों या गुटों में विभक्त है या फिर विल ड्यूरेंट द्वारा किये हुए वर्गीकरण पर आधारित है अंतर बस इतना है की "ब्रह्मण अर्थात अंग्रेजी नौकरशाही, क्षत्रिय अर्थात अंग्रेजी सेना, वैश्य अर्थात अंग्रेजी व्यपारी और अछूत शूद्र अर्थात राष्ट्रभक्त हिन्दू जनता".

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आपका विचार सच्चाई के बहुत करीब है। मनु स्मृति या किसी भी आर्ष ग्रन्थ में आज की जाति व्यवस्था नहीं लिखी और न ही छुआ-छूत को मान्यता दी यदि कोई ऐसा कहता है तो वो १०० प्रतिशत उसमें बाद में जोड़ा गया है मनु या अन्य किसी भी महापुरुष ने ऐसा नहीं लिखा। महाभारत के पश्चात वास्तविक कर्म आधारित ब्रह्मण विद्वानों की कमी के कारण और देश की राजनीतिक व्यवस्था के बिगड़ जाने पर जिसके मन में जो आया वो ऋषियों के नाम पर लिखा जैसे कहते हैं महर्षि व्यास ने सभी पुराणों की रचना की, वाम मर्गियों ने कहा शास्त्रों में यज्ञों में बलि, मदिरापान, उल्टे-सीधे योन-संबंद्ध आदि घिनोने कार्य लिखे हैं, इन्द्र किसी ऋषि पत्नी के साथ ऋषि की अनुपस्थिति में व्यभिचार किया करता था और ऋषि श्राप के कारण वो पत्थर बन गई और भी पता नहीं क्या-क्या बकवासबाजी लिखी, प्रमाणित उपनिषद हैं तो १० या १३ किन्तु अब १०८ और उससे अधिक बताते हैं जिनमें वास्तविक उपनिषदों को छोड़ कर अन्य में साम्प्रदायिकता भरी हुई है। आज अधिकतर वैदिक ग्रंथों में प्रक्षिप्त श्लोक मिल जायेंगे किन्तु जो प्रमाणिक हैं उनमें कोई भी बात न्याय विरुद्ध नहीं मिलेगी। उन प्रक्षिप्त श्लोकों के आधार पर लोग वैदिक शास्त्रों की बुराई करने लगते हैं और हिन्दू समाज को विभिन्न सम्प्रदायों में विभाजित करने का कार्य करते हैं। वेदों में वर्ण व्यवस्था विज्ञान सम्मत है और उसको कोई माने या न माने किन्तु प्रत्येक मनुष्य उन ४ वर्गों में से ही एक होता है। जाति शब्द वेदों या प्रमाणित शास्त्रों में इस तरह से आया है मनुष्य जाति, अश्व जाति, मार्जार जाति, वानर जाति आदि और इन विभिन्न जातियों में विवाह निषेध है तो इसमें गलत क्या है। आज इसका स्वरुप स्वार्थी, प्रमादी और मुर्ख लोगो द्वारा कुछ का कुछ कर दिया है। छुआ-छूत का जहर पूरे समाज में फैला दिया है जिसके कारण देश को सैकड़ो वर्षो से बहुत अधिक हानि हो रही है। आज इसी कारण ऐसे लोग राज कर रहे हैं जिसकी किसी राष्ट्रभक्त को पूर्व में कल्पना भी नहीं होगी और देश विखंडन की और अग्रसर है। हमें इस बात को सदैव याद रखनी चाहिए कि जिस समाज में योग्यता का आदर नहीं होता वह अन्ततः विनाश को प्राप्त करता है। ब्रह्मानन्द मिश्र

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आप धन्यवाद के पात्र है / पुरातन भारत की पहचान ही जातियों के आधार पर ही टिकी थी जिसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा था सक्षम लोगो ने लाठी तलवार की ताकत पर अपना वर्चश्व्य कायम किया था....... किसी भी देश की ताकत उस देश की जनता होती है भारत में भी उस समय की सारी व्यस्था ऋषि मुनियों द्वारा संचालित होती थी जिस कारण से वर्ण व्यस्था अस्तित्व में आई और पूरे भारत का विभाजन चार वर्णों में बट गया और समाज का कार्य व्यहार उसी के अनुरूप चलने लगा अगर मै यह कहूँ की इस व्यस्था ने देश को बहुत ही अच्छे कारीगर दिए जैसे की (विभाजन से पूर्व) ढाका की मलमल जिसके दीवाने पूरे संसार में थे तथा कोई भी कार्य पारिवारिक होने के नाते कहीं बहार सीखने के लिए नहीं जाना पड़ता था ........आज भी अगर किसी किसान का एक बेटा पढ़ लिख कर अधिकारी बन जाय तो क्या वह खेत में भी काम करेगा ! नहीं इसी प्रकार से उस समय के समाज के मनीषियों ने प्रत्येक कार्य को जाति के साथ जोड़ दिया जिसका कोइ विरोध नहीं कर सकता था / जिसका परिणाम कालांतर में बढ़ा ही दुखद हुआ की चौथे वर्ण के लोगो का जीवन नारकीय होता चला गया, और उन्हें सभी प्रकार के लाभों से वंचित होना पड़ा और सदियां बीत जाने के बाद आज भी दशा नहीं सुधरी है / परन्तु आजादी के बाद एक बात अवश्य हुई की कानून बना कर चौथे वर्ण में शामिल कुछ विशेष वर्ग के लोगों को सरकारी नौकरियों में जाती पर आधारित आरक्षण दिया गया जिसका परिणाम कोई उत्साह जनक नहीं है जिनको आरक्षण मिला न तो वह लोग खुश है क्योंकि किसी - किसी परिवार में आज साठ वर्षों के बाद ४-६ आई ए एस मिल जायंगे तथा कहीं पर पहले से भी बुरी दशा में मिलेंगे और न ही चौथे वर्ण की बाकी जातियों के लोग जिनको आरक्षण मिला ही नहीं तथा जिनके काबिल बच्चे अच्छे नंबर होने पर भी बहुत से स्कूल कालिजों दाखिला तथा दफ्तरों में नौकरियों से वंचित रह जाते है \ इस जाति आधारित आरक्षण ने बाकी तीनो वर्णों में शामिल आर्थिक रूप से पिछड़े / एवं गरीब को तो बिलकुल तोड़ कर रख दिया है जिसका एक दुष्परिणाम तो सामने आ ही रहा है कुछ पिछड़ी जातियों के सम्प्पन लोग भी आरक्षण के लिए आन्दोलन कर रहे है / जब इस जाति आधारित आरक्षण ने नौकरियों में भारतीय वर्ण व्यस्था को समाप्त ही कर दिया है तो सरकार और नेतओं डर किस बात का है / अब जब सरकार ने निर्णय ले ही लिया है तो कुछ नेतओं के पेट में दर्द उठने लगा है कारण वोही जाने एक बार जाति गणना अव्यशय ही होनी चाहिए जिससे की दूध का दूध और पानी पानी अलग हो जायगा

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सत्येन्द्र जी,हम स्वाधीन हुए कब?स्वाधीनता की पहली शर्त आत्म-अनुशासन है,क्या है हममें यह?वास्तव में हम स्वतंत्र होने/रहने लायक हैं ही नहीं,न्याय-पालिका क्या,सभी तरफ अंधेरगर्दी और अन्याय है,क्या विधायिका में सही लोग हैं या कार्य-पालिका का स्वरुप और कार्यप्रणाली सही है?हमें वैसी ही व्यवस्था मिलती है जिसके लायक हम होते हैं,आज कानून और व्यवस्था सक्षम और सबलों के हित में ही कार्य करती है,क्या सबलों में आत्मा-अनुशासन है जो वो गलत-सही में अंतर करके सही कार्य करें?अगर मुझे किसी गलत काम से लाभ होता है तो भले ही कितने ही हमवतनों का नुकसान होता हो,क्या ये सोचकर हम उस गलत काम को नहीं करते?इसी से व्यवस्था बिगडती है,और आज जो हाल है उसके लिए हम खुद दोषी हैं,हममें दूसरों कीऔर व्यवस्था की गलती निकालकर गाल बजाने की अच्छी आदत है,उससे हमें अपने अन्दर झांककर खुद को सुधरने की जरूरत जो नहीं पड़ती,हम दूसरों की जिम्मेदारी तो समझते हैं अपनी न तो समझते हैं न ही मानते हैं?व्यवस्था के सारे अंग और समूची व्यवस्था समाज का आइना होती है,जैसा समाज होगा वैसी व्यवस्था हो और मिलेगी,वैसे अभी तक हम खुद कोई काम नहीं करना चाहते जब तक हमसे वो काम डंडे से ना करवाया जावे,हममें आत्म-अनुशासन ही नहीं है इसलिए हम आज भी गुलाम हैं,गरीबी के,भुखमरी के,बेरोजगारी के,हिंसा के,अन्याय के,आतंकवाद के,

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आदरणीय मिश्रा जी, छत्तीसगढ़ियों के कठिन हालात का इससे बेहतर वर्णन नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद आपका यह कहना कि " मैं उनके शोषण को शब्द नहीं दे पा रहा हूं", इस विषय पर आपके जेहन में चल रही बड़ी उथल-पुथल का संकेत ही है। नक्सलवाद पर मैं आपकी ओर से ऐसे ही किसी लेख का लंबे समय से इंतजार कर रहा था, जो अब जाकर खत्म हुआ है। लेख की शुरूआत बेहद रोचक है और पाठकों को अंत तक पढ़ने के लिए बाध्य करती है। वहीं स्वर्गीय चं! ्रशेखर जी का बयान पूरी तरह समसामयिक और हाथ में हथियार थामने वाले हताश लोगों का दर्द बताने के लिए काफी है। आपका यह कहना" हमारे अंदर की वह राक्षसी प्रवृति है जो किसी भी कमजोर को देखते ही उसका खून चूसने के लिए लपलपाने लगती है", मन को झकझोर देता है। खैर इस बहस पर जाए बिना कि नक्सली सही हैं या गलत, कहा जा सकता है कि विकास ही समस्या का एकमात्र समाधान है। सलवा जुडूम जैसी कोशिशें और बेहतर हो! नीे चाहिए। इस विषय में म! ेरे विचारों को आप नीचे दिए गए लिंक पर जाकर जरूर पढ़ें।

के द्वारा:

आदरणीय मिश्रा जी, छत्तीसगढ़ियों के कठिन हालात का इससे बेहतर वर्णन नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद आपका यह कहना कि " मैं उनके शोषण को शब्द नहीं दे पा रहा हूं", इस विषय पर आपके जेहन में चल रही बड़ी उथल-पुथल का संकेत ही है। नक्सलवाद पर मैं आपकी ओर से ऐसे ही किसी लेख का लंबे समय से इंतजार कर रहा था, जो अब जाकर खत्म हुआ है। लेख की शुरूआत बेहद रोचक है और पाठकों को अंत तक पढ़ने के लिए बाध्य करती है। वहीं स्वर्गीय चंद्रशेखर जी का बयान पूरी तरह समसामयिक और हाथ में हथियार थामने वाले हताश लोगों का दर्द बताने के लिए काफी है। आपका यह कहना" हमारे अंदर की वह राक्षसी प्रवृति है जो किसी भी कमजोर को देखते ही उसका खून चूसने के लिए लपलपाने लगती है", मन को झकझोर देता है। खैर इस बहस पर जाए बिना कि नक्सली सही हैं या गलत, कहा जा सकता है कि विकास ही समस्या का एकमात्र समाधान है। सलवा जुडूम जैसी कोशिशें और बेहतर होनीे चाहिए। इस विषय में मेरे विचारों को आप नीचे दिए गए लिंक पर जाकर जरूर पढ़ें। www.bharat-bhagya.blogspot.com

के द्वारा:

सत्येन्द्र जी, आपने बस्तर, दंतेवाडा की बिलकुल सही तस्वीर पेश की, जैसा लोग सोचते हैं वैसा कुछ भी नहीं है.......मेरे बचपन के कुछ साल इस बस्तर जिले में ही बीते हैं.............मुझे याद नहीं की मैंने कभी सुना कि किसी नक्सलवादी ने किसी निर्दोष की जान ले ली या आम जनता को परेशान किया हो............. हो सकता है इनका तरीका गलत हो, पर ये नक्सलवादी, आतंकवादी नहीं हैं और ना ही आतंक फैलाना इनका उद्देश्य है.......... बस्तर में नक्सलवाद कि समस्या आज की बात नहीं है, २०-२५ साल पहले से यहाँ ये आन्दोलन चलता रहा है......... पर हमारी सरकार हमेशा की तरह इन २५ सालों में सोई ही रही......और तब जागी जब पानी सिर से निकल चूका है.........अगर पहले ही इस पर ध्यान दिया होता तो आज ये हालात कभी ना होते.........

के द्वारा: aditi kailash aditi kailash

लेख में आदिवासियों के शोषण की कहानी एक हद तक सही है। संभव है सच्चाई और कड़वी हो लेकिन उससे भी भयावह सच यह है कि इन शोषित वंचित आदिवासियों की कमान दुंर्दांत लोगों के हा्थों में जो भारतीयता के  दुश्मन  हैं। इनके पीछे उन तत्वों का हाथ ब ता.या जा रहा है जिनकी सरपरस्ती लादेन कर रहा है। या माओवाद के नाम पर देश के दुश्मन कर रहे हैं। गलती जिसकी भी हो हो चुकी है। अब उसकी सजा बेगुनाह लोगों को क्यों मिले और इस खून खराबे से तो दंतेवाड़ा के आदिवासियों का भी कोई भला नहीं होना है। इसके पीछे जो तत्व हैं वे भी आदिवासियों का शोषण ही कर रहे हैं। वे उनको ढ़ाल बनाकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। जो हो रहा है वह देश को गृहयुद्ध के मुहाने पर ले जा रहा है.। इस भयावह स्थिति के पहले ही सरकार को इन तत्वों को कुचल देना चाहिए। इस प्रक्रिया में कुछ न कुछ निर्दोष तो मारे ही जाएंगे। निर्दोष तो वैसे भी मारे जा रहे हैं आखिर मेदिनी पुर हादसे में जो 200 ट्रेन या त्री मारे गए वे भी तो निर्दोष ही थे। 

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सत्येंद्र जी आपका लेख इन अंधी, बहरी, गूंगी केंद्र और राज्य सरकारों के चक्षु खोल दे, यही ईश्वर से प्रार्थना है। आपनी सही संकेत दिया है कि विशेषण माओवाद, आतंकवाद या कुछ भी हो सकता है लेकिन है तो यह दबंगई ही। पहले इसे जमींदारी, सामंती कहते थे और अब इसे माओवादी का नाम दिया जा रहा है। पहले भी गरीबों और निरीहों का खूब बहाया जाता था, आज भी यही हो रहा है। इन गरीबों, निरीहों में देश के वे जवान भी शामिल हैं जो माओवादी आतंकवाद के निशाने पर आ गए। गहन मंथन के बाद मुझे अहसास हो रहा है कि आजादी के बाद हमें शिक्षा की गलत पद्धति ही उपलब्ध कराई गई जिससे आजादी के दीवानों का जुनून हाशिये पर चला गया और पुरानी दकियानूसी बातें और हरकतें हावी हो गईं। शायद यहीं सुधार की जरूरत है ताकि लोग विवेकशील बनें और संवेदना के बल पर अपना और समाज का विकास करें।

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कसबा को पाकिस्तान को सौंप देने से आतंकवाद की समस्या का समाधान हो जाएगा ऐसा नहीं लगता। पाकिस्तान तो स्वयं आतंकवाद से त्रस्त है। वहां भी तो आए दिन मारकाट होती रहती है। आतंकवादियों की एक अलग नस्ल ही है। जिससे पूरी मानवता को निपटना है। यह केवल भारत या पाकिस्तान की ही समस्या नहीं है। दुख  तो इस बात है कि अमेरिका जैसा सशक्त राष्ट्र आतंकवाद से निपटने के नाम पर लुकाछिपी का खेल खेल रहा है। इस अंतरराष्ट्रीय समस्या से दृढ़ इच्छाशक्ति से ही निपटा जा सकता है। और इसके खिलाफ समूचे विश्व को खड़ा होना होगा। वरना डंडे का जोर तो सबपर चलता है और आतंकवादी इसी की भाषा जानते हैं। 

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अरे भाई यह लेख तो बदलाव का संकेत दे रहा है। धुर दंक्षिणपंथ में बदलाव। आप वह दिन भूल गए जब भाजपा के एक  केंद्रीय मंत्री आतंकवादियों की एक खेप ही लेकर कंधार गए थे। क्या हुआ, आखिर तालिबान का जनक भी तो पाकिस्तान ही है। संघ के मुखपत्र पांचजन्य तो कसाब को फांसी की वकालत की है फिर सत्येंद्र जी आप यह बेसुरा राग क्यों अलाप रहे हैं।  एक सच यह है कि भारत विरोध पर ही पाकिस्तान की नींव टिकी हुई है। उसके हुक्मरां जब तक अपनी हार का बदला नहीं ले लेंगे या इस बुरी तरह टूट नहीं जाएंगे कि उनकी प्रतिरोध की क्षमता खत्म हो या खुदा उन्हें बुद्धि दे तब तक वे सुधरने वाले नहीं है।  

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